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बुधवार, 19 सितंबर 2012

मेरी सेक्सी दीदी



मेरी बी.ऐ की परीक्षा ख़तम हो गई थी। मै अपनी चचेरी दीदी के यहाँ घूमने नैनीताल गया। उनसे मिले हुए मुझे कई साल हो गए थे। जब में सातवीं में पढता था तभी उनकी शादी फौज के रणवीर सिंह के साथ हो गई। अब वो लोग नैनीताल में रहते थे। मेंने सोचा चलो दीदी से मिलने के साथ साथ नैनीताल भी घूम लूँगा। वहां पहुँचने पर दीदी बहूत खुश हुई।

बोली - अरे तुम इतने बड़े हो गए। मैंने तुम्हे जब अपनी शादी में देखा था तो तुम सिर्फ़ ११ साल के थे।

मैंने कहा - जी दीदी अब तो मै बीस साल का हो गया हूँ।

दीदी ने मुझे खूब खिलाया पिलाया। जीजा जी अभी पिछले तीन महीने से कश्मीर में अपनी ड्यूटी पर थे। दीदी की शादी हुए आठ साल हो गए थे। दीदी की एक मात्र संतान तीन साल की जूही थी जो बहूत ही नटखट थी। वो भी मुझसे बहूत ही घुल -मिल गई। शाम को जीजा जी का फ़ोन आया तो मैंने उनसे बात की। वो भी बहूत खुश थे मेरे आने पर।
बोले - एक महीने से कम रहे तो कोर्ट मार्शल कर दूँगा।

रात को यूँ ही बातें करते करते और पुरानी यादों को ताज़ा करते करते मै अपने कमरे में सोने चला गया। दीदी ने मेरे लिए बिस्तर लगा दिया
और बोली - अब आराम से सो जाओ।

मै आराम से सो गया। किंतु रात के एक बजे नैनीताल की ठंडी हवा से मेरी नींद खुल गई। मुझे ठण्ड लग रही थी। हालाँकि अभी मई का महिना था लेकिन मै मुंबई का रहने वाला आदमी भला नैनीताल की मई महीने की भी हवा को कैसे बर्दाश्त कर सकता। मेरे पास चादर भी नही था। मैंने दीदी को आवाज लगाई । लेकिन वो शायद गहरी नींद में सो रही थी। थोडी देर तो मै चुप रहा लेकिन जब बहूत ठण्ड लगने लगी तो मै उठ कर दीदी के कमरे के पास जा कर उन्हें आवाज लगाई। दीदी मेरी आवाज़ सुन कर हडबडी से उठ कर मेरे पास चली आई और

कहा - क्या हुआ गुड्डू?

वो सिर्फ़ एक गंजी और छोटी सी पेंट जो की औरतों की पेंटी से थोडी ही बड़ी थी। गंजी भी सिर्फ़ छाती को ढंकने की अधूरी सी कोशिश कर रही थी। में उनकी ड्रेस को देख के दंग रह गया। दीदी की उमर अभी उनतीस या तीस की ही होती रही होगी। सारा बदन सोने की तरह चमक रहा था। में उनके बदन को एकटक देख ही रहा था की दीदी ने फिर

कहा- क्या हुआ गुड्डू?

मेरी तंद्रा भंग हुई।

मैंने कहा -दीदी मुझे ठण्ड लग रही है। मुझे चादर चाहिए।

दीदी ने कहा - अरे मुझे तो गर्मी लग रही है और तुझे ठंडी?

मैंने कहा -मुझे यहाँ के हवाओं की आदत नही है ना।

दीदी ने कहा -अच्छा तू रूम में जा , में तेरे लिए चादर ले कर आती हूँ।

मै कमरे में आ कर लेट गया। मेरी आंखों के सामने दीदी का बदन अभी भी घूम रहा था। दीदी का अंग अंग तराशा हुआ था। थोडी ही देर में दीदी एक कम्बल ले कर आयी और मेरे बिस्तर पर रख दी।

बोली - पता नही कैसे तुम्हे ठण्ड लग रही है। मुझे तो गर्मी लग रही है। खैर , कुछ और चाहिए तुम्हे?

मैंने कहा- नही, लेकिन कोई शरीर दर्द की गोली है क्या?

दीदी बोली- क्यों क्या हुआ?

मैंने कहा - लम्बी सफर से आया हूँ। बदन टूट सा रहा है।

दीदी ने कहा- गोली तो नही है। रुक में तेरे लिए कॉफ़ी बना के लाती हूँ। इससे तेरा बदन दर्द दूर हो जायेगा.

मैंने कहा- छोड़ दो दीदी , इतनी रात को क्यों कष्ट करोगी?

दीदी ने कहा -इसमे कष्ट कैसा? तुम मेरे यहाँ आए हो तो तुम्हे कोई कष्ट थोड़े ही होने दूँगी।

कह कर वो चली गई। थोडी ही देर में वो दो कप कॉफ़ी बना लायी। रात के डेढ़ बाज़ रहे थे। हम दोनों कॉफ़ी पीने लगे।

कॉफ़ी पीते पीते वो बोली - ला, में तेरा बदन दबा देती हूँ। इस से तुम्हे आराम मिलेगा।

मैंने कहा - नही दीदी, इसकी कोई जरूरत नही है। सुबह तक ठीक हो जाएगा।

लेकिन दीदी मेरे बिस्तर पर चढ़ गई
और बोली - तू आराम से लेटा रह मै अभी तेरी बदन की मालिश कर देती हूँ .

कहते कहते वो मेरे जाँघों को अपनी जाँघों पे रख कर उसे अपने हाथों से दबाने लगी। मैंने पैजामा पहन रखा था। वो अपनी नंगी जाँघों पर मेरे पैर को रख कर उसे दबाने लगी।

दबाते हुए बोली - एक काम कर, पैजामा खोल दे, सारे पैर में अच्छी तरह से तेल मालिश कर दूँगी। ।

अब मैं किसी बात का इनकार करने का विचार त्याग दिया। मैंने झट अपना पैजामा खोल दिया। अब मैं अंडरवियर और बनियान में था। दीदी ने फिर से मेरे पैर को अपनी नंगी जांघों पे रख कर तेल लगा कर मालिश करने लगी। जब मेरे पैर उनकी नंगी और चिकनी जाँघों पे रखी थी तो मुझे बहूत आनंद आने लगा। दीदी की चूची उनकी ढीली ढीली गंजी से बाहर दिख रही थी. उसकी चूची की निपल उनकी पतली गंजी में से साफ़ दिख रही थी. मै उनकी चूची को देख देख के मस्त हुआ जा रहा था. उनकी जांघ इतनी चिकनी थी की मेरे पैर उस पर फिसल रहे थे. उनका हाथ धीरी धीरे मेरे अंडरवियर तक आने लगा। उनके हाथ के वहां तक पहुंचने पर मेरे लंड में तनाव आने लगा। मेरा लंड अब पूरी तरह से फनफनाने लगा। मेरा लंड अंडरवियर के अन्दर करीब छः इंच ऊँचा हो गया। दीदी ने मेरी पैरों को पकड़ कर मुझे अपनी तरफ खींच लायी और मेरे दोनों पैर को अपने कमर के अगल बगल करते हुए मेरे लंड को अपने चूत में सटा दी. मुझे दीदी की मंशा गड़बड़ लगने लगी. लेकिन अब मै भी चाहता था कि कुछ ना कुछ गड़बड़ हो जाने दो.

दीदी ने कहा - गुड्डू , तू अपनी बनियान उतर दो न। छाती की भी मालिश कर दूँगी।

मैंने बिना समय गवाए बनियान भी उतर दिया। अब मैं सिर्फ़ अंडरवियर में था। वो जब भी मेरी छाती की मालिश के लिए मेरे सीने पर झुकती उनका पेट मेरे खड़े लंड से सट रहा था. शायद वो जान बुझ कर मेरे लंड को अपने पेट से दबाने लगी. एक जवान औरत मेरी तेल मालिश कर रही है। यह सोच कर मेरा लिंग महाराज एक इंच और बढ़ गया। इस से थोडा थोडा रस निकलने लगा जिस से की मेरा अंडरवियर गीला हो गया था.

अचानक दीदी ने मेरे लिंग को पकड़ कर कहा - ये तो काफी बड़ा हो गया है तेरा।

दीदी ने जब मुझसे ये कहा तो मुझे शर्म सी आ गयी कि शायद दीदी को मेरा लंड बड़ा होना अच्छा नही लग रहा था. मुझे लगा शायद वो मेरे सुख के लिए मेरा बदन मालिश कर रही है और मै उनके बदन को देख कर मस्त हुआ जा रहा हूँ और गंदे गंदे ख़याल सोच कर अपना लंड को खड़े किये हुआ हूँ.

इसलिए मैंने धीमे से कहा- ये मैंने जान बुझ कर नहीं किया है. खुद ब खुद हो गया है.

लेकिन दीदी मेरे लंड को दबाते हुए मुस्कुराते हुए कही- बच्चा बड़ा हो गया है. जरा देखूं तो कितना बड़ा है मेरे भाई का लंड.

ये कहते हुए उसने मेरा अंडरवियर को नीचे सरका दिया. मेरा सात इंच का लहलहाता हुआ लंड मेरी दीदी की हाथ में आ गया. अब में पूरी तरह से नंगा अपनी दीदी के सामने था। दीदी ने बड़े प्यार से मेरे लिंग को अपने हाथ में लिया। और उसमे तेल लगा कर मालिश करने लगी।

दीदी ने कहा - तेरा लिंग लंबा तो है मगर तेरी तरह दुबला पतला है। मालिश नही करता है इसकी?

मैंने पुछा - जीजा जी का लिंग कैसा है?

दीदी ने कहा- मत पूछो। उनका तो तेरे से भी लंबा और मोटा है।

वो बोली- कभी किसी लड़की को नंगा देखा है?

मैंने कहा - नहीं.

उसने कहा - मुझे नंगा देखेगा?

मैंने कहा - अगर तुम चाहो तो .

दीदी ने अपनी गंजी एक झटके में उतार दी.
गंजी के नीचे कोई ब्रा नही थी। उनके बड़ी बड़ी चूची मेरे सामने किसी पर्वत की तरह खड़े होगए।उनकी दो प्यारी प्यारी चूची मेरे सामने थी.

दीदी पूछी- मुठ मारते हो?

मैंने कहा - हाँ।

दीदी- कितनी बार?

मैंने - एक दो दिन में एक बार।

दीदी- कभी दूसरे ने तेरी मुठ मारी है?

मैंने -हाँ ।

दीदी- किसने मारी तेरी मुठ?

मैंने- एक बार में और मेरा एक दोस्त ने एक दुसरे की मुठ मारी थी।

दीदी - कभी अपने लिंग को किसी से चुसवा कर माल निकाला है तुने?

मैंने- नही।

दीदी - रुक , आज में तुम्हे बताती हूँ की जब कोई लिंग को चूसता है तो चुस्वाने वाले को कितना मज़ा आता है। 

इतना कह के वो मेरे लिंग को अपने मुंह में ले ली। और पूरे लिंग को अपने मुंह में भर ली। मुझे ऐसा लग रहा था की वो मेरे लिंग को कच्चा ही खा जायेगी। अपने दाँतों से मेरे लिंग को चबाने लगी। करीब तीन चार मिनट तक मेरे लिंग को चबाने के बाद वो मेरे लिंग को अपने मुंह से अन्दर बाहर करने लगी। एक ही मिनट हुआ होगा की मेरा माल बाहर निकलने को बेताब होने लगा।

मैंने- दीदी , छोड़ दो, अब माल निकलने वाला है।

दीदी - निकलने दो ना .

उन्होंने मेरे लिंग को अपने मुंह से बाहर नही निकाला। लेकिन मेरे माल बाहर आने लगा। दीदी ने सारा माल पी जाने के पूरी कोशिश की लेकिन मेरे लिंग का माल उनके मुंह से बाहर निकल कर उनके गालों पर भी बहने लगा। गाल पे बह रहे मेरे माल को अपने हाथों से पोछ कर हाथ को चाटते हुए
बोली - अरे, तेरा माल तो एकदम से मीठा है। कैसा लगा आज का मुठ मरवाना?

मैंने - अच्छा लगा।

दीदी - कभी किसी बुर को चोदा है तुने?

मैंने - नही, कभी मौका ही नही लगा।

फिर बोली- मुझे चोदेगा?

मैंने - हाँ।

दीदी - ठीक है .

कह कर दीदी खड़ी हो गई और अपनी छोटे से पैंट को एक झटके में खोल दिया। उसके नीचे भी कोई पेंटी नही थी। उसके नीचे जो था वो मैंने आज तक हकीकत में नही देखा था। एक दम बड़ा, चिकना , बिना किसी बाल का, खुबसूरत सा बुर मेरी आँखों के सामने था।

अपनी बुर को मेरी मुंह के सामने ला कर बोली - ये रहा मेरा बुर, कभी देखा है ऐसा बुर ? अब देखना ये है की तुम कैसे मुझे चोदते हो। सारा बुर तुम्हारा है। अब तुम इसका चाहे जो करो।

मैंने कहा- दीदी, तुम्हारा बुर एकदम चिकना है। तुम रोज़ शेव करती हो क्या?

दीदी- तुम्हे कैसे पता की बुर चिकना होता है की बाल वाला??

मैंने कहा- वो मैंने अपनी नौकरानी का बुर तीन चार बार देखा है। उसके बुर में एकदम से घने बाल हैं। उसकी बुर तो काली भी है। तुम्हारी तरह सफ़ेद बुर नही है उसकी।

दीदी- अच्छा, तो तुमने अपनी नौकरानी की बुर कैसे देख ली है?

मैंने कहा - वो जब भी मेरे कमरे में आती है ना तो अगर मुझे नही देखती है तो मेरे शीशे के सामने एकदम से नंगी हो कर अपने आप को निहारा करती है। उसकी यह आदत मैंने एक दिन जान लिया । तब से में तीन चार बार जान बुझ कर छिप जाता हूँ और वो सोचती थी की में यहाँ कमरे नही हूँ, वो वो नंगी हो मेरे शीशे के सामने अपने आप को देखती थी।

दीदी- बड़े शरारती हो तुम।

मैंने कहा- वो तो मैंने दूर से काली सी गन्दी सी बुर को देखा था जो की घने बाल के कारण ठीक से दिखाई भी नही देते थे। लेकिन आपकी बुर तो एक दम से संगमरमर की तरह चमक रही है।

दीदी- वो तो में हर संडे को इसे साफ़ करती हूँ। कल ही न संडे था। कल ही मैंने इसे साफ़ किया है।

अब मुझसे रहा नही जा रहा था। समझ में नही आ रहा था की कहाँ से स्टार्ट किया जाए ? मुझे कुछ नही सूझा तो मैंने दीदी को पहले अपनी बाहों से पकड़ कर बिस्तर पर लिटा दिया ।अब वो मेरे सामने एकदम नंगी पड़ी थीं । पहले मैंने उनके खुबसूरत जिस्म का अवलोकन किया ।दूध सा सफ़ेद बदन। चुचियों की काया देखते ही बनती थी । लगता था संगमरमर के पत्थर पे किसी ने गुलाब की छोटी कली रख दिया हो। उनकी निपल एकदम लाल थी। सपाट पेट। पेट के नीचे मलाईदार सैंडविच की तरह फूली हुई बुर . बुर का रंग एकदम सोने के तरह था। उनके बुर को हाथ से फाड़ कर देखा तो अन्दर लाल लाल तरबूज की तरह नज़ारा दिखा। कही से भी शुरू करूं तो बिना सब जगह हाथ मारे उपाय नही दिखा। सोचा ऊपर से ही शुरू किया। जाए । मैंने सबसे पहले उनके रसीले लाल ओठों को अपने ओठों में भर लिया । जी भर के चूमा । इस दौरान मेरे हाथ दीदी के चुचियों से खेलने लगे । दीदी ने भी मेरा किस का पूरा जवाब दिया . फिर में उनके ओठों को छोड़ उनके गले होते हुए उनकी चूची पर आ रुका . काफ़ी बड़ी और सख्त चूचियां थी . एक बार में एक चूची को मुंह में दबाया और दुसरे को हाथ से मसलता रहा . थोडी देर में दूसरी चूची का स्वाद लिया . चुचियों का जी भर के रसोस्वदन के बाद अब बारी थी उन के महान बुर के दर्शन का . ज्यों ही में उन के बुर पास अपना सर ले गया मुझसे रहा नही गया और मैंने अपनी जीभ को उनके बुर के मुंह पर रख दिया . स्वाद लेने की कोशिश की तो हल्का सा नमकीन सा लगा । मजेदार स्वाद था . अब में पूरी बुर को अपने मुंह में लेने की कोशिश करने लगा . दीदी मस्त हो कर सिसकारी निकालने लगी . मैं समझ रहा था कि दीदी को मज़ा आ रहा है . मैं और जोर जोर से दीदी का बुर को चुसना शुरू किया . करीब पन्द्रह मिनट तक में दीदी का बुर का स्वाद लेता रहा । अचानक दीदी ज़ोर से आँख बंद कर के कराही और उन के बुर से माल निकल कर उनके बुर के दरार होते हुए गांड की दरार की और चल दिए . मैंने जहाँ तक हो सका उनके बुर का रस का पान किया . मैंने देखा अब दीदी पहले की अपेक्षा शांत हैं . लेकिन मेरा लिंग महाराज एकदम से तनतना गया . मैंने दीदी के दोनों पैरों को अलग अलग दिशा में किया और उनके बुर की छिद्र पर अपना लिंग रखा और धीरे धीरे दीदी के बदन पर लेट गया . इस से मेरा लिंग दीदी के बुर में प्रवेश कर गया . ज्यों ही मेरा लिंग दीदी के बुर में प्रवेश किया दीदी लगभग छटपटा उठी .

मैंने कहा - क्या हुआ दीदी, जीजा जी का लिंग तो मुझसे भी मोटा है ना तो फ़िर तुम छटपटा क्यों रही हो ?

दीदी - तीन महीने से कोई लिंग बुर में नही ली हूँ न इसलिए ये बुर थोड़ा सिकुड़ गया है .उफ़, लगता नही है की तुम्हे चुदाई के बारे में पता नही है। कितनो की ली है तुने?

मैं बोला- कभी नही दीदी, वो तो में फिल्मों में देख के और किताबों में पढ़ कर सब जानता हूँ।

दीदी बोली- शाबाश गुड्डू, आज प्रेक्टिकल भी कर लो। कोई बात नही है। तुम अच्छा कर रहे हो। चालू रहो। मज़ा आ रहा है।

मैंने दीदी को अपने दोनों हाथों से लपेट लिया। दीदी ने भी अपनी टांगों को मेरे ऊपर से लपेट कर अपने हाथों से मेरी पीठ को लपेट लिया। अब हम दोनों एक दुसरे से बिलकूल गुथे हुए था। मैंने अपनी कमर धीरे से ऊपर उठाया इस से मेरा लिंग दीदी के बुर से थोड़ा बाहर आया। मैंने फिर अपना कमर को नीचे किया। इस से मेरा लिंग दीदी के बुर में पूरी तरह से समां गया। इस बार दीदी लगभग चीख उठी।

अब मैंने दीदी की चीखूं और दर्द पर ध्यान देना बंद कर दिया। और उनको पुरी प्रेम से चोदना शुरू किया। पहले नौ - दस धक्के में तो दीदी हर धक्के पर कराही । लेकिन दस धक्के के आड़ उनकी बुर चौडी हो गई॥ तीस पैंतीस धक्के के बाद तो उनका बुर पूरी तरह से फैल गया। अब उनको आनंद आने लगा था। अब वो मेरे चुतद पर हाथ रख के मेरे धक्के को और भी जोर दे रही थी। चूँकि थोडी देर पहले ही ढेर सारा माल निकल गया था इस लिए जल्दी माल निकालने वाला तो था नहीं. मै उनकी चुदाई करते करते थक गया। करीब बीस मिनट तक उनकी बुर चुदाई के बाद भी मेरा माल नही निकल रहा था।

दीदी बोली - थोड़ा रुक जाओ।

मैंने दीदी के बुर में अपना सात इंच का लिंग डाले हुए ही थोडी देर के लिए रुक गया। मेरी साँसे तेज़ चल रही थी। दीदी भी थक गई थी। मैंने उनकी चूची को मुंह में भर कर चुसना शुरू किया। इस बार मुझे शरारत सूझी। मैंने उनकी चूची में दांत गडा दिए। वो चीखी.

बोली- क्या करते हो?

फिर मैंने उनके ओठों को अपने मुंह में भर लिया। दो मिनट के विश्राम के बाद मैंने अपने कमर को फिर से हरकत में लाया। इस बार मेरी स्पीड काफ़ी बढ़ गई। दीदी का पूरा बदन मेरे धक्के के साथ आगे पीछे होने लगा।

दीदी बोली- अब छोड़ दो गुड्डू। मेरा माल निकल गया।

मैंने उनकी चुदाई जारी रखते हुए कहा- रुको न.अब मेरा भी निकल जाएगा।

चालीस -पचास धक्के के बाद में लिंग के मुंह से गंगा जमुना की धारा बह निकली . सारी धारा दीदी के बुर के विशाल कुएं में समा गयी । एक बूंद भी बाहर नही आई। बीस मिनट तक हम दोनों को कुछ भी होश नही था। मै उसी तरह से उनके बदन पे पड़ा रहा।

बीस मिनट के बाद वो बोली -गुड्डू , तुम ठीक तो हो न?

मैंने बोला -हाँ।

दीदी - कैसा लगा बुर की चुदाई कर के?

मैंने - मज़ा आ गया।

दीदी- और करोगे?

मैंने - अब मेरा माल नही निकलेगा।

दीदी हँसी और बोली- धत पगले। माल भी कहीं ख़तम होता है। रुको में तुम्हारे लिए कॉफ़ी बना के लाती हूँ।

दीदी नंगे बदन ही किचन गई और कॉफ़ी बना कर लायी। कॉफ़ी पीने के बाद फिर से ताजगी छा गई। दीदी के जिस्म देख देख के मुझे फिर गर्मी चढ़ने लगी।

दीदी ने मेरे लिंग को पकड़ कर कहा- क्या हाल है जनाब का?

मैंने कहा - क्यों दीदी , फिर से एक राउंड हो जाए?

दीदी - क्यों नही। इस बार आराम से करेंगे।

दीदी बिस्तर पर लेट गई। पहले तो मैंने उनके बुर को चाट चाट के पनिया दिया। मेरा लिंग महाराज बड़ी ही मुश्किल से दुबारा तैयार हुआ। लेकिन जैसे ही मैंने उनको दीदी के बुर देवी से भेंट करवाया वो तुंरत ही जाग गए। सुबह के चार बज गए थे। उसी समय अपने लिंग महाराज को दीदी के बुर देवी कह प्रवेश कराया। पूरे पैंतालिस मिनट तक दीदी को चोदता रह। दीदी की बुर ने पाँच छः बार पानी छोड़ दिया।

वो मुझसे बार बार कहती रही -गुड्डू छोड़ दो। अब नही। कल करना।

लेकिन मैंने कहा नही दीदी अब तो जब तक मेरा माल नही निकल जाता तब तक तुम्हारे बुर का कल्याण नही है।

पैंतालिस मिनट के बाद मेरे लिंग महाराज ने जो धारा निकाली तो मेरे तो जैसे प्राण ही निकल गए। जब दीदी को पता चला की मेरा माल निकल गया है तो जैसे तैसे अपने ऊपर से मुझे हटाई और अपने कपड़े लिए खड़ी हो गई। में तो बिलकूल निढाल हो बिस्तर पे पड़ा रहा . दीदी ने मेरे ऊपर कम्बल रखा और बिना कपड़े पहने ही हाथ में कपड़े लिए अपने कमरे की तरफ़ चली गई . आँख खुली तो दिन के बारह बज चुके थे . में अभी भी नंगा सिर्फ़ कम्बल ओढे हुए पड़ा था . किसी तरह उठ कर कपड़े पहना और बाहर आया . देखा दीदी किचेन में है .

मुझे देख कर मुस्कुराई और बोली - एक रात में ही ये हाल है , जीजाजी का आर्डर सुना है ना पूरे एक महीने रहना है । हां हां हां हां !!!!

इस प्रकार दीदी की चुदाई से ही मेरा यौवन का प्रारम्भ हुआ . मैं वहां एक महीने से भी अधिक रुका जब तक जीजा जी नही आ गए। इस एक महीने में कोई भी रात मैंने बिना उनकी चुदाई के नही गुजारी। दीदी ने मुझसे इतनी अधिक प्रैक्टिस करवाई की अब एक रात में पाँच बार भी उनकी बुर की चुदाई कर सकता था। उन्होंने मुझे अपनी गांड के दर्शन भी कई बार करवाई। कई बार दिन में हम दोनों ने साथ स्नान भी किया।

आख़िर एक दिन जीजाजी भी आ गए। जब रात हुई और जीजाजी और दीदी अपने कमरे में गए तो थोडी ही देर में दीदी की चीख और कराहने की आवाज़ ज़ोर ज़ोर से मेरे कमरे में आने लगी। में तो डर गया। लगता है की दीदी की चुदाई का भेद खुल गया है और जीजा जी दीदी की पिटाई कर रहे हैं। रात दस बजे से सुबह चार बजे तक दीदी की कराहने की आवाज़ आती रही।

सुबह जैसे ही दीदी से मुलाकात हुई तो मैंने पुछा - कल रात को जीजाजी ने तुम्हे पीटा? कल रात भर तुम्हारे कराहने की आवाज़ आती रही।

दीदी बोली- धत पगले। वो तो रात भर मेरी चुदाई कर रहे थे। चार महीने की गर्मी थी इसलिए कुछ ज्यादा ही उछल कूद हो रही थी।

मैंने कहा- दीदी अब में जाऊँगा।

दीदी ने कहा - कब? मैंने कहा - आज रात ही निकल जाऊँगा।

दीदी बोली- ठीक है। चल रात की खुमारी तो निकाल दे मेरी।

मैंने कहा - जीजाजी घर पे हैं। वो जान जायेंगे तो।

दीदी बोली- वो रात को इतनी बेयर पी चुके हैं की दोपहर से पहले नही उठने वाले।

दीदी को मैंने अपने कमरे में ले जा कर इतनी चुदाई की की आने वाले दो - तीन महीने तक मुझे मुठ मारने की भी जरूरत नही हुई। जीजा जी ने जब दीदी को आवाज़ लगायी तभी दीदी को मुझसे मुक्ति मिली। आखिरी बार मैंने दीदी के बुर को किस किया और वो अपने कपड़े पहनते हुए अपने कमरे में जीजा जी से चुदवाने फिर चली गई। उसी रात को मैंने अपने घर की ट्रेन पकड़ ली.

चाची के साथ होटल में मज़े किये



मेरा नाम रवि है. बात उन दिनों की है जब मेरी उम्र 19 साल की थी और मै इंजीनियरिंग के पहले साल में बंगलौर में पढ़ रहा था. मै बनारस का रहने वाला हूँ. मेरे सेमेस्टर के एक्जाम समाप्त हो गए थे. और कुछ दिनों की छुट्टी के लिए घर आया था. मेरा घर संयुक्त परिवार का है. मेरे परिवार के अलावा मेरे चाचा एवं चाची भी साथ में ही रहते थे. मेरे चाचा पेशे से हार्डवेयर के थोक विक्रेता थे. उन्होंने काफी धन कमाया रखा था उन्होंने. उनकी शादी को सात साल हो गए थे लेकिन अभी तक कोई संतान नहीं हुई थी. चाची की उम्र 28  साल की थी. वो बनारस जिले के ही एक गाँव की थी. थी तो देहाती लेकिन देखने में मस्त थी. उनकी जवानी पुरे शवाब पर थी. झक गोरा बदन और कटीले नैन नक्श और गदराये बदन की मालकिन  थी. वो लोग ऊपर के मंजिल में रहते थे. जब चाचा दूकान और मेरे पापा अपने कार्यालय चले जाते थे तो मै और चाची दिन भर ऊपर बैठ कर गप्पें हाकां करते थे. चाची का नाम मोना था. सच कहूँ तो वो मुझे अपना दोस्त मानती थी. वो मेरे सामने बड़े ही सहज भाव से रहती थी. अपने कपडे लत्ते भी मेरे सामने ठीक से नहीं पहनती थी. उनकी चूची की आधी दरार हमेशा दिखती रहती थी. कभी कभी तो सेक्स की बात भी कर डालती थी. जब भी मुझे अकेली पाती थी तो हमेशा डबल मीनिंग बात बोलती थी. जैसे बछडा भी दूध देता है. तेरा डंडा कितना बड़ा है? तुझे स्पेशल दवा की जरुरत है. आदी .   दिन भर मेरे कालेज और बंगलौर के किस्से सुनते रहती थी. जब मेरे बंगलौर जाने के छः दिन शेष रह गए थे तभी एक दिन चाची ने कहा - वो लोग भी बंगलौर घुमने जाना चाहते हैं.

मैंने कहा - हाँ क्यों नहीं. आप दोनों (चाचा-चाची) मेरे साथ ही अगले शनिवार को चलिए. मै आप दोनों को वहां की पूरी सैर करवा दूंगा.

चाची ने अपना प्लान चाचा को बताया. चाचा तुरंत मान गए. मैंने उसी समय इन्टरनेट से हम तीनो का टिकट एसी फर्स्ट क्लास में कटवाया. अगले शनिवार को हमारी ट्रेन थी. अगले शनिवार को सुबह हम तीनो ट्रेन से बंगलौर के लिए रवाना हुए. अगले दिन रविवार को शाम सात बजे हम सभी बंगलौर पहुच चुके थे. मैंने उनको एक बढ़िया सा होटल में कमरा दिला दिया. उसके बाद मै वापस अपने होस्टल आ गया. होस्टल आने पर पता चला कि कल  से कालेज के क्लर्क लोग अपनी वेतन बढाने के मांग को ले कर अनिश्चित कालीन हड़ताल पर जा रहे हैं. और इस दौरान कालेज बंद रहेगा. मेरे अधिकाँश मित्रों को ये बात पता चल गयी थी. इसलिए सिर्फ 25 - 30  प्रतिशत छात्र ही कालेज आये थे.

मै अगले दिन करीब 11 बजे  अपने चाचा के कमरे पर गया.वहां दोनों नाश्ता कर रहे थे. चाची ने मेरे लिए भी नाश्ता लगा  दिया. मैंने देखा कि चाचा कुछ परेशान हैं. पूछने पर पता चला कि जिस कम्पनी का उन्होंने फ्रेंचाइजी ले रखा है उस कम्पनी ने दुबई में जबरदस्त सेल ऑफ़र किया है . अब चाचा की परेशानी ये थी कि अगर वो वापस चाची को बनारस छोड़ने जाते और वहां से दुबई जाते तो तक तक सेल  समाप्त हो जाती. और अगर साथ में ले कर दुबई जा नही सकते थे क्यों कि चाची का कोई पासपोर्ट वीजा था ही नहीं.

मैंने कहा - अगर आप दुबई जाना चाहते हैं तो आप चले जाएँ. क्यों कि मेरा कालेज अभी एक साप्ताह बंद रह सकता है. मै चाची को या तो बनारस पहुंचा दूंगा या फिर आपके वापस आने तक यहीं रहेगी. आप दुबई से यहाँ आ जाना और फिर घूम फिर कर चाची के साथ वापस बनारस चले जाना.

चाचा को मेरा सुझाव पसंद आया.

चाची ने भी कहा - हां जी, आप बेफिक्र हो कर जाइए. और वापस यहीं आइयेगा . तब तक रवि मुझे बंगलौर घुमा देगा. आपके साथ मै दोबारा घूम कर वापस आपके साथ ही बनारस चले  जाऊंगी. चाचा को चाची का ये सुझाव भी पसंद आया.

लैपटॉप पर इन्टरनेट  खोल कर देखा तो उसी दिन के  दो बजे की फ्लाईट में सीट खाली थी. चाचा ने तुरंत सीट बुक की और हम तीनो एयरपोर्ट की और निकल पड़े. दो बजे चाचा की फ्लाईट ने दुबई की राह पकड़ी और मैंने एवं चाची ने बंगलौर बाज़ार की. चाची के साथ लंच  किया. घूमते घूमते हम मल्टीप्लेक्स आ गए. शाम के सात  बज गए थे. चाची ने कहा - काफी महीनो से  मल्टीप्लेक्स में सिनेमा नहीं देखा. आज देखूंगी.

मैंने देखा कि कोई नई पिक्चर आयी थी इसलिए सारी टिकट बिक चुकी थी. उसके किसी हाल  में कोई एडल्ट टाइप की इंग्लिश पिक्चर की हिंदी वर्सन लगी हुई है. फिल्म चार सप्ताह से चल रही थी इसलिए अब उसमे कोई भीड़ नही थी. मैंने 2 टिकट सबसे कोने का लिया और हाल के अन्दर चला गया. मुझे सबसे ऊपर की कतार वाली सीट दी  गयी थी. और उस पूरी कतार में दुसरा कोई भी नही था. हमारी कतार के पीछे सिर्फ दीवार थी. मैंने जान बुझ कर ऐसी सीट मांगी थी.  मेरा आगे वाले तीन कतार के बाद कोने पर एक लड़का और लड़की अकेले थे. उस कतार में भी उसके अलावे कोई नही था. उसके अगले कतार में दुसरे कोने पर एक और जोड़ा था. इस तरह से उस समय 300 दर्शकों की क्षमता वाले  हाल में सिर्फ 20 - 22  दर्शक  रहे होंगे. पता नही इतने कम दर्शकों के लिए फिल्म क्यों लगा रखा था.  वो मेरे दाहिने और बैठी. चाची के दाहिने दिवार थी. तुरंत ही फिल्म चालू हो गयी.

फिल्म शुरू होने के तुरंत बाद ही मेरे बाद के  चौथे कतार में बैठे लड़के एवं लड़की ने एक दुसरे के होठों को किस करना चालू कर दिया. हालांकि बंगलोरे के सिनेमा घरों में इस तरह के सीन आम बात हैं. हर शो में कुछ लड़के लड़की सिर्फ इसलिए ही आते हैं.

चाची ने उस जोड़े की तरफ मुझे इशारा कर के कहा - हाय देख तो रवि. कैसे एक दुसरे खुलेआम को चूस रहे हैं .

मैंने कहा - चाची , यहाँ आधे से अधिक सिर्फ इसलिए ही आते हैं. सिनेमा हाल ऐसे जगह के लिए बेस्ट है. तू उस कोने पर बैठे उस जोड़े को तो देख. वो भी वही काम कर रहा है. अभी  तो सिर्फ एक दुसरे को किस कर रहे हैं ना. आगे देखना क्या क्या करते हैं. तू ध्यान मत दे इन सब पर. सब मस्ती करते हैं. यही तो लाइफ है.

चाची - तुने भी कभी मस्ती की या नहीं इस तरह से सिनेमा हाल में.

मैंने कहा - अभी तक तो नहीं की. लेकिन अब के बाद पता नहीं. 


तुरंत ही फिल्म में सेक्सी सीन आने शुरू हो गए. मेरी चाची ने मेरे कान में फुसफुसा कर कहा - हाय राम, जरा देखो तो ये कैसी सिनेमा है.

मैंने कहा - चाची, ये बंगलौर है. यहाँ सब इसी तरह की फिल्मे रहती है. अब देखो चुपचाप आराम से . ऐसी फिल्मो के मज़े लो. बनारस में ये सब देखने को नहीं मिलेगी.

वो पूरी फिल्म सेक्स पर ही आधारित थी. मेरी चाची अब गरम  हो  रही  थी. वो गरम गरम साँसे फेंक रही थी. उसका बदन ऐठ रहा था. शायद वो  पहली बार किसी हाल में एडल्ट फिल्म देख रही थी. मैंने पूछा - क्यों चाची? पहले कभी देखी है ऐसी मस्त फिल्म?

चाची - नहीं रे. कभी नही देखी.

मैंने धीरे धीरे अपना दाहिना हाथ उनके पीछे से ले जा कर उनके कंधे पर रख दिया. मैंने देखा कि चाची अपने हाथ से अपने चूत  को साड़ी के ऊपर से सहला रही है. शायद सेक्सी सीन देख कर उनकी चूत गीली हो रही थी. मेरा भी लंड खड़ा हो गया था. मैंने भी अपना बायाँ  हाथ अपने लंड पर रख दिया.  मैंने धीरे धीरे चाची के  पीठ पर दाहिना हाथ फेरा. उसने कुछ नही कहा . वो अपनी चूत को जोर जोर से रगड़ रही थी. मैंने उनकी पीठ पर से हाथ फेरना छोड़ दाहिने हाथ से उनके गले को लपेटा और अपनी तरफ उसे खींचते हुए लाया. चाची मेरी तरफ झुक गयी.

मैंने पूछा- क्यों चाची, मज़ा आ रहा है फिल्म देखने में?

चाची ने शर्माते हुए कहा - धत ! मुझे तो बड़ी शर्म आ रही है.

मैंने कहा - क्यों ? इसमें शर्माना कैसा? तुम और चाचा तो ऐसा करते होंगे न?  तेरे एक हाथ जहाँ हैं न उस से तो लगता है कि मज़े आ रहे हैं तुझे.

चाची - हाय राम, बड़ा बेशरम हो गया है तू रे बंगलौर में रह कर. बड़ा देखता है यहाँ - वहां कि कहाँ हाथ हैं. कहाँ नहीं.

मैंने चाची के कानो को अपने मुह के पास लाया और कहा - जानती हो चाची? ऐसी फिल्मे देख कर मुझे भी कुछ कुछ होने लगता है.

चाची ने अपने होठ को मेरे होठो के पास लगभग सटाते हुए कहा - क्या होने लगता है?

मैंने अपने लंड को घसते  हुए कहा  - वही, जो तुझे हो रहा है न. मन करता है कि यहीं निकाल दूँ.

चाची - सिनेमा हाल में निकालते हो क्या?

मैंने - कई बार निकाला है. आज तू है इसलिए रुक गया हूँ.

चाची - आज यहाँ मत निकाल. बाद में निकाल लेना.  

थोड़ी देर में फिल्म की नायिका ने अपनी चूची मसलवा रही थी. हम दोनों और गर्म हो गए. तो मैंने चाची के कान में अपने होठ  सटा कर कहा - देख चाची, साली के चूची क्या मस्त है. नहीं?

चाची - ऐसी तो सब की होती है.

मैंने - तेरी है क्या ऐसी चूची?

चाची - और नहीं तो क्या?

मैंने - तेरी चूची  छू कर देखूं  क्या ?

चाची - हाँ , छू कर देख ले.

मैंने अपना दाहिना  हाथ से उनके चूची को पकड़ लिया और दबाने लगा. उसने अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया और आराम से अपने चूची को दबवाने लगी. मैंने धीरे धीरे अपना दाहिना हाथ उनके ब्लाउज  के अन्दर डाल दिया. फिर ब्रा के अन्दर हाथ डाल कर उनका बड़े बड़े चुचीयों को मसलने लगा. वो मस्त हुई जा रही थी. 
मैंने - अपनी ब्लाउज खोल दे न. तब मज़े से दबाऊंगा.
 

उसने कहा - यहाँ?

मैंने कहा और नहीं तो क्या? साडी को अपने चूची से ढके रहना. यहाँ कोई नहीं देखने वाला.

वो भी गरम हो चुकी थी. उसने ब्लाउज खोल दिया. लगे हाथ उसने अपना ब्रा भी खोल दिया. और अपने नंगी चूची को अपनी साड़ी से ढक लिया. मैंने मज़े ले ले कर उसके नंगी चूची को सिनेमा हाल में ही दबाना चालू कर दिया.  


मै जो चाहता था वो मुझे  करने दे रही थी. मुझे पूरी आजादी दे रखी थी. थी. मैंने अपने बाएं हाथ से उनके बाएं हाथ को पकड़ा और उसके हाथ को अपने लंड पर रख दिया.

और धीरे से कहा- देखो न. कितना खड़ा हो गया है. चाची ने मेरे लंड को जींस के ऊपर से दबाना चालू कर दिया.

अब मैंने देख लिया कि चाची पूरी तरह से गर्म है तो मैंने अपना हाथ उनके ब्लाउज से निकाला और उसके पेट पर ले जा कर नाभी को सहलाने लगा. धीरे धीरे मैं अपने हाथ को नुकीला बनाया और नाभी के नीचे उनके साड़ी के अन्दर डाल दिया. चाची थोड़ी चौड़ी हो गयी जिस से मुझे हाथ और नीचे ले जाने में सहूलियत हो सके. मैंने अपना हाथ और नीचे किया तो उनकी पेंटी मिल गयी. मैंने उनकी पेंटी में हाथ डाला और उनके चूत पर हाथ ले गया. ओह क्या चूत थे. एक दम घने बाल. पूरी तरह से चिपचिपी  हो गयी थी. मैंने काफी देर तक उनकी चूत को सहलाता रहा. और वो मेरे लंड को दबा रही थी. मैंने अपने दाहिने हाथ की  एक ऊँगली उनके चूत के अन्दर घुसा दी. वो पागल सी हो गयी.

उसने आस पास देखा तो कोई भी हम लोग के आस पास नहीं था. उसने अपनी साड़ी को नीचे से उठाया और जांघ के ऊपर तक ले आयी. फिर मेरे हाथ को साड़ी के ऊपर से हटा कर नीचे से खुले हुए रास्ते से ला कर अपनी चूत पर रख दी. और बोली - अब आराम से कर, जो करना है.

अब मै उसके चूत को आराम से छू रहा था. उसने अपनी पेंटी को नीचे सरका दिया था. मैंने उसकी चूत में उंगली डालनी शुरू की तो उसने अपनी चूत और चौड़ी कर ली.

उसने मेरे कान में कहा - तू भी अपनी जींस की पेंट खोल ना. मै भी तेरी सहलाऊं .

मैंने जींस का चेन खोल दिया. लंड किसी राड की तरह खड़ा था. चाची ने बिना किसी हिचक के मेरे लंड को पकड़ा और सहलाने लगी . मै  भी उसकी चूत में अपनी उंगली डाल कर अन्दर बाहर करने लगा. वो सिसकारी भर रही थी. मेरा लंड भी एकदम चिपचिपा हो गया था.

मैंने कहा - चाची, अब बर्दाश्त नहीं होता. अब मुझे मुठ मार  कर माल निकालना ही पडेगा.

चाची - आज मै मार देती हूँ तेरी मुठ. मुझसे 
मुठ मरवाएगा?

मैंने कहा - तुझे 
आता है लंड का मुठ मारना ?

चाची - मुझे क्या नही आता? तेरे चाचा का लगभग हर रात को मुठ मारती हूँ. सिर्फ हाथ से ही नही...किसी और से भी..

मैंने कहा - किसी और से कैसे?

चाची - तुझे नही पता कि  लंड का मुठ मारने में हाथ के अलावा और किस चीज का इस्तेमाल होता है?

मैंने कहा - पता है मुझे. मुंह से ना.

चाची - तुझे तो सब पता है.

मैंने कहाँ - तू  
चाचा का लंड अपने मुंह में ले कर चूसती है?

चाची - हाँ रे, बड़ा मजा आता है मुझे और उनको.

मैंने कहा - तू चाचा का माल कभी पी है?

चाची - बहुत बार. एकदम नमकीन मक्खन की तरह लगता है.

मैंने- तू तो बहुत एक्सपर्ट है. मेरी भी मुठ मार दे ना आज. अपने हाथों से ही सही. 


चाची ने मेरे लंड को तेजी से ऊपर नीचे करना शुरू कर दिया. सचमुच काफी एक्सपर्ट थी वो. चाची सिनेमा हाल के अँधेरे में मेरा मुठ मारने लगी.  पहली बार कोई मेरा मुठ मार रही थी. मै ज्यादा देर बर्दास्त नहीं कर पाया. धीरे से बोला - हाय चाची,  मेरा निकलने वाला है. चाची ने तुरन अपने साड़ी का पल्लू मेरे लंड पर लपेटा. सारा माल मैंने चाची के साड़ी में ही गिरा दिया.

फिर मैंने चाची के चूत में उंगली अन्दर बाहर  करने लगा. चाची भी एडल्ट फिल्म की गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पायी. उनका माल भी निकलने लगा. उसने तुरंत अपने चूत में से मेरी ऊँगली निकाली और अपने साड़ी के पल्लू में अपना माल पोंछ डाला.

2 मिनट बाद अचानक बोली - रवि, चलो यहाँ से, अपने होटल के कमरे में.

मैंने कहा - क्यों? अभी तो फिल्म ख़त्म भी नहीं हुई है.

चाची - नहीं, अभी चलो, मुझे काम है तुमसे.

मैंने - क्या काम है मुझसे?

चाची- वही. जो अभी यहाँ कर रहे हो. वहां आराम से करेंगे.

मैंने कहा - ठीक है चलो.

और हम लोग फिल्म चालू होने के 45 मिनट बाद ही निकल गए. हमारा होटल वहां से पांच  मिनट की  दुरी पर ही था. वहां से हम सीधे अपने कमरे में आये. कमरे में आते ही चाची ने अपनी साड़ी उतरा फेंकी. लपक कर मेरी शर्ट और जींस खोल दी. अब मै सिर्फ अंडरवियर में था. चाची ने अगले ही पल अपनी ब्लाउज को खोल दिया. और पेटीकोट भी उतार दी. अब वो भी सिर्फ ब्रा और पेंटी  में और मै सिर्फ अंडरवियर में था.

वो मुझे अपने सीने के लपेट कर पागलों की तरह चूमने लगी. मेरे पुरे बदन को चाटने लगी. 


चाची- रवि , आ जा, अब जो भी करना है आराम से कर. मुझे भी तेरी काफी प्यास लगी है . मेरी प्यास बुझा दे. चीर डाल मुझे.

मैंने अपना अंडरवियर खोल दिया. मेरा 9 इंच का लंड किसी तोप की भांति चाची के तरफ खडा था. मै आगे बढ़ा और अपना लंड चाची के हांथों में थमा दिया. चाची मेरे लंड को सहलाने लगी. बोली - बाप रे बाप !   कितना बड़ा लंड है रे.

मैंने मोना (चाची) के चुचियों का दबाते हुए कहा - मोना चाची, तू बड़ी मस्त है. चाचा को तो खूब मज़े देती होगी तू.

मोना - तू भी ले न मज़े. तू चाचा का भतीजा है. तेरा भी उतना ही हक बनता है मुझ पर. और तू मुझे सिर्फ मोना कह ना. चाची क्यों पुकारता है मुझे. अब से तू मेरा दुसरा पति है 

मैंने - हाँ मोना. क्यों नहीं.

मोना - हाय, कितना अच्छा लगता है जब तू मुझे मेरे नाम से बुलाता है. सच बता कितनी को चोदा है तू अब तक?

मैंने - अब तक एक भी मोना डार्लिंग, आज तुझसे ही अपनी ज़िंदगी की पहली चुदाई शुरू करूँगा. 

मैंने मोना के ब्रा को खोला और नंगी चूची को आज़ाद किया. साली की चूची तो ऐसी थी कि आज तक मैंने किसी ब्लू फिल्मों  की रंडियों की चूचियां भी वैसी नहीं देखी. एकदम चिकनी और गोरी. एक तिल का भी दाग नही था. मैंने उसकी घुंडियों को अपने मुंह में लिया और चूसने लगा. मोना सिसकारी भरने लगी. मैंने उसे लिटा  दिया. उसके बदन के हर अंग को चूसते हुए उसके पेंटी पर आया. उसकी पेंटी बिलकूल गीली  हो चुकी थी. मैंने उसकी पेंटी के ऊपर से ही उसके चूत को चूसने  लगा.

मोना पागल सी हो रही थी. मैंने धीरे धीरे उसकी पेंटी को उसकी चूत पर से हटाया. आह ! क्या शानदार चूत थी. लगता ही नहीं था कि पिछले चार साल से इसकी चुदाई हो रही थी. गोरी गोरी चूत पर काले काले झांट. ऐसा लगता था चाँद पर बादल छ गए हों. मैंने झांटों को हाथ से बगल किया और उसके चूत को उँगलियों से फैलाया. अन्दर एकदम लाल नजारा देख कर मेरा दिमाग ख़राब हो रहा था. मैंने झट से उसकी लाल लाल चूत में अपनी लपलपाती जीभ डाली. और स्वाद लिया. फिर मैंने अपनी पूरी जीभ जहाँ तक संभव हुआ उसकी चूत में घुसा कर चूस चूस कर स्वाद लेता  रहा. मोना जन्नत में थी. उसने अपने दोनों टांगो से  मेरे सर को लपेट लिए और अपने चूत की  तरफ दबाने लगी. दस मिनट तक उसकी चूत चूसने के बाद उसके चूत से माल निकलने लगा. मैंने बिना किसी शर्म के सारा माल को चाट लिया. मोना बेसुध हो कर पड़ी थी. वो मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी.

मैंने कहा - सच बता मोना, चाचा से पहले कितनो से चुदवाई है तू?

मोना - तेरे चाचा से पहले सिर्फ दो ने चोदा है मुझे .

 मैंने कहा - हाय, किस किस ने तुझे भोग रे?


 

मोना - जब मै सोलह साल की थी तब स्कूल की एक सहेली के भाई ने मुझे तीन बार चोदा. फिर जब मै उन्नीस साल की थी तो कालेज में मेरा एक फ्रेंड था. हम सब एक जगह पिकनिक पर गए थे. तब उसने मुझे वहां एक बार चोदा. एक साल बाद तो मेरी शादी ही तेरे चाचा से हो गयी. 

मैंने - तब तो मै चौथा  मर्द हुआ तेरा न? 


मोना - हाँ. लेकिन सब से प्यारा मर्द. 


मै उसके बदन पर लेट गया आर उसके रसीले होठ को अपने होठ में लिए और अपनी जीभ उसके मुंह में डाल दिया. कभी वो मेरी जीभ चुस्ती कभी मै उसकी जीभ चूसता. इस बीच मैंने उसके दोनों टांगो को फैलया और उसके चूत में उंगली डाल दिया. मोना ने मेरी लंड पकड़ी और उसे अपने चूत के छेद के ऊपर ले गयी और हल्का सा घुसा दी. अब शेष काम मेरा था. मैंने उसके जीभ को चाटते हुए ही एक झटके में अपना लंड उसके चूत में पूरा डाल दिया. वो दर्द में मारे बिलबिला गयी.

बोली - अरे , रवि, फाड़ देगा क्या रे? निकाल रे .

लेकिन मै जानता था कि ये कम रंडी नहीं है. इसे कुछ नहीं होगा. मैंने उसकी दोनों बाहें पकड़ी और अपने लंड को उसके चूत में धक्के लगा शुरू कर दिया. वो कस के अपनी आँखें बंद कर रही थी और दबी जुबान से कराह रही थी. लेकिन मुझे उस पर कोई रहम नहीं आ रहा था. बल्कि उसके चीख में मुझे मजा आ रहा था. 70 -75  धक्के के बाद उसकी चीखें बंद हो हो गयी. अब उसकी चूत  पूरी तरह से मेरे लंड को सहने योग्य चौड़ी हो गयी थी. अब वो मज़े लेने लगी. उसने अपनी आँखे खोल कर मुस्कुरा कर कहा - हाय रे रवि. बड़ा जालिम है रे तू. मुझे तो लगा मार ही डालेगा .

मैंने कहा - मोना डार्लिंग, मै तुझे कैसे मार सकता हूँ रे. तू तो अब मेरी जान बन गयी है. और तुझे तो आदत होगी न बचपन से?

मोना हंसने लगी. बोली - लेकिन इतना बड़ा लंड की आदत नहीं है मेरे शेर राजा. . मज़ा आ रहा है तुझ से चुदवा कर.
     
करीब दस मिनट तक चोदने के बाद मेरे लंड से माल निकलने पर हो गया. मैंने कहा - मोना डार्लिंग, माल निकलने वाला है.

मोना - निकलने दो न वहीँ.

अचानक मेरे लंड से गंगा जमुना बहने लगी और मै पूरा जोर लगा कर मोना की चूत में अपना लंड घुसा दिया. मोना कराह उठी.

थोड़ी देर बाद हम दोनों को होश आया. मेरा लंड उसके चूत में ही था.

मै उसके नंगे बदन पर से उठा. समय देखा तो नौ बजने को थे. मैंने पूछा - मोना नहाएगी?

मोना - हाँ रे, चल न.

मैंने उसे अपनी गोद में उठाया. उसने भी हँसते हुए अपनी दोनों बाहें मेरे गले में लपेटा और हम दोनों बाथरूम में आ गए. वहां मैंने मोना को बाथटब में डाल दिया. फिर शावर को टब की  ओर घुमाया और चला दिया.  अब नीचे भी पानी और ऊपर से भी पानी बरस रहा था. मै मोना के  ऊपर लेट गया. अब हम ठन्डे पानी में एक दुसरे के आगोश में थे. मेरे होठ उसके होठ चूम रहे थे. मेरे एक हाथ उसके चुचियों से खेल रहे थे और मेरे दसरे हाथ उसके चूत के छेद में ऊँगली कर रहे थे. और वो भी खाली नही थी. वो मेरे लंड को दबा रही थी. दस मिनट तक ठन्डे पानी में एक दुसरे के बदन से खेलने के बाद हम दोनों का शरीर फिर गर्म हो गया. मैंने उसके टांगों को टब के ऊपर रखा और अपने लंड को उसके सुराख में डाला और पानी में डूबे डूबे ही उसे 20  मिनट तक आराम से चोदता रहा. इस दौरान मेरे और उसके होठ कभी अलग नहीं हुए. अचानक मेरे लंड ने माल निकालना चालू किया तो मै उसे चोदना छोड़ कर उसके चूत में लंड को पूरी ताकत के साथ दबाया और स्थिर हो गया और मेरे होठ का दवाब उसके होठ पर और ज्यादा बढ़ गया. जब मै उसके होठ के अपने होठ अलग किया तो उसने कहा - कितनी देर तक  चोदते हो, मेरी जान तुम्हे पता है मेरा दो बार माल निकल चूका था इस चुदाई में. मै कब से कहना चाहती थी लेकिन तुमने मेरे होठों पर भी अपने होठो से ताला लगा दिया था. 

मैंने कहा   - मोना डार्लिंग, सच बताना, कैसा लगा मेरा लंड का करिश्मा?

मोना - मानना पड़ेगा, सच में मज़ा आ गया मुझे तो आज. अब चल कुछ खा -पी ले. अभी तो पुरी रात बांकी है.

मैंने बाथरूम के ही फोन पर से खाने के लिए चिकन, पुलाव, बियर और सिगरेट रूम में ही मंगवा लिया. थोड़ी देर में कमरे की घंटी बजी. मै टावेल लपेट कर बहार आया. और खाना टेबल पर रखवा कर वेटर को वापस किया. कमरे का दरवाजा बंद कर के मैंने मैंने मोना को आवाज दिया. मोना नंगे ही बाथरूम से बाहर आई. मैंने भी टावेल खोल दिया. फिर हम दोनों ने जम के चिकन-पुलाव खाया  और बियर पी. मोना पहले भी बियर पीती थी. चाचा पिलाता था. मेरे कहने पर उस ने उस दिन 3 सिगरेट भी पी ली. उसके बाद मैंने उसकी कम से कम  10 - 11   बार चुदाई  की. कभी उसकी चूत की चुदाई , तो कभी गांड की चुदाई, तो कभी मुंह की चुदाई. कभी चूची की चुदाई.

साली मोना भी कम नही थी. एक दम रंडी की तरह रात भर चुदवाते रही. सारी  रात मैंने उसे लुटा. सुबह के आठ बजे तक मैंने उसकी चुदाई करी. तब जा कर मोना को थकान हुई.  तब बोली - रवि , अब मै थक गयी हूँ. अब बाथरूम चल न.

मैंने उसे उठा कर बाथरूम ले गया. बाथरूम में संडास के दो सीट थे. एक देसी और एक विदेशी. उसे देसी सीट पसंद थी. मै विदेशी सीट पर बैठ गया और संडास करने लगा. वो मेरे सामने ही देसी सीट पर बैठ कर  संडास करने लगी. मुझे उसकी संडास की खुसबू भी अच्छी लग रही थी.

मैंने कहा - मोना , तेरी गांड मै धोऊंगा आज.   

उसने कहा - ठीक है. मै भी तेरी गांड धोउंगी .

संडास कर के हम दोनों उठे. मैंने उसे सर नीचे कर के गांड उठाने कहा . उसने ऐसा ही किया. इस से उसका गांड खुल गया. मैंने पानी से अच्छे से उसके गांड में लगे पैखाने को अपने हाथ से साफ़ किया.

फिर मैंने भी वही पोजीशन बनायी . उसने भी मेरी गांड को अपने हाथ से साफ़ किया.

फिर हम दोनों लगभग एक घंटे तक टब में डूबे रहे और एक दुसरे के अंगों  से खेलते रहे. टब में दो बार उसी चुदाई करी.

फिर वापस कमरे में आ कर नाश्ता मंगवाया. और नाश्ता कर के हम दोनों जो सोये तो सीधे पांच बजे उठे. 
हम दोनों नंगे थे.उसने मेरे लंड पर हाथ साफ़ करना शुरू किया. लंड दूसरी पारी के लिए एकदम से तैयार हो गया.
 मै मोना के बदन पर चढ़ गया और उसके चूत में अपना नौ इंच का लंड घुसेड दिया. 


तभी चाचा का फोन आया. लेकिन मैंने मोना की चुदाई बंद नही की. मोना ने मुझसे चुदवाते हुए अपने पति यानी मेरे चाचा से बात की. उन्होंने कहा कि वो दुबई पहुँच गए हैं. फिर मोना से पूछा कि क्या तुमने रवि के साथ बंगलौर घूमी या नहीं. मोना ने मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा और फोन पर कहा - रवि को फुर्सत ही नहीं मिलता है. जब आप आयेंगे तभी मै आपके साथ घुमुंगी. तब तक आपका इंतज़ार करती हूँ.

फोन रख कर उसने बगल से सिगरेट उठाया और जला कर कश लेते हुए कहा - क्यों रवि? तब तक तुम मुझे जन्नत की सैर करवाओगे न?

मैंने हँसते हुए अपने लंड के धक्के उसके चूत में तेज किया और कहा - क्यों नहीं मोना डार्लिंग.लेकिन तू हैं बड़ी कमीनी चीज.

मोना ने भी मेरे लंड के धक्के पर कराहते हुए मुस्कुरा कर कहा - तू भी तो कम हरामी नहीं है. पक्का मादरचोद है तू. मौका मिले तो अपनी माँ को भी चोद डालेगा तू.

मैंने कहा- पक्की रंडी है तू साली. एकदम सही पहचाना मुझे. तुझ पर तो मेरी तभी से नजर थी जब से तू मेरे घर पर चाची बन के आई थी . अब जा के मौका मिला है तुझे चोदने का.

मोना - हाय मेरे हरामी राजा. पहले क्यों नही बताया. इतने दिन तक तुझे प्यासा तो ना रहना पड़ता.

मैंने कहा - सब्र का फल मीठा होता है मेरी जान.

तब तक मेरे लंड का माल उसके चूत में निकल चुका था. अब मै उसके बदन पर निढाल सा पडा था और वो सिगरेट के कश ले रही थी.  


और फिर....अगले 6 दिन तक हम दोनों में से कोई कमरे के बाहर भी नहीं निकला जब तक कि चाचा दुबई से वापस नहीं आ गए.   
    
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